Biodiversity / social innovation

गाँधीवादी देवदूत – समतभाई जाड़ा

गुजरात के चोटिला तालुका में धेरै गाँव के समतभाई सही मायनों में लोगों के व्यक्ति हैं। उन्होंने सिचाईं, वृक्ष और सेहत सहित कई सकारात्मक विषयों पर जागरूकता फ़ैलाने के लिए पड़ोस के 11 गाँवों में कई कार्यक्रम किए हैं। सुरेंद्रनगर और राजकोट जिले की सीमा पर उनका तालुका है। यह क्षेत्र पथरीला और पहाड़ी भूमि है। इस क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं की कमी है।a022
किसान समतभाई को बीड़ी का नशा था। वे खेत में रासायनिक खाद और कीटनाशक का उपयोग करते थे। एक बार एक कंपनी के अधिकारी ने उनसे संपर्क किया और उन्हें रासायनिक दवाओं का उनके गाँव का विक्रेता बना दिया।
लेकिन समतभाई में एक बड़ा परिवर्तन आया और उन्होंने किसी भी प्रकार के नशे से मुक्त हो गए। उन्होंने पहले धूम्रपान छोड़ा फिर खेती में रसायन का उपयोग भी बंद कर दिया। समतभाई और उनकी पत्नी गौरीबहन को मालूम था कि अनुदान पर उपलब्ध रासायनिक खाद के उपयोग से कम समय में खेती में बेहतर लाभ होता है। इसके बावजूद उन्होंने रासायनिक खाद का उपयोग नहीं करने का निर्णय लिया।
समतभाई ने 2003 में अपने पूरी तरह से बंजर खेत पर मूँगफली की जैविक खेती शुरू की। उन्होंने एक छोटे टुकड़े पर इसकी शुरुआत की फिर आत्मविश्वास बढ़ने पर पूरे खेत में इसे बोने लगे। उन्होंने दो साल की भीतर अपने खेत को पूरी तरह से जैविक खेत में बदल दिया। उन्होंने मानसून के मौसम में मूँगफली, बाजरा, तिल और ठण्ड में गेहूँ और जीरा की खेती की। वे जानवरों के प्राप्त जैविक स्त्रोत का उपयोग खेत में करते।
उन्हें 12 से 14 घंटे अपने खेत में कठिन परिश्रम करना पड़ता था। फ़सल बढ़ने पर जंगली जानवरों से इसे नुकसान होने का खतरा रहता था। फ़सल की रक्षा के लिए उन्हें खेत के समीप ही रात में सोना पड़ता था। फसल काटने के बाद उसे बाजार में बेचने की भी व्यवस्था करनी होती थी।
उन्होंने प्रयास करके धीरे-धीरे जैविक उत्पाद के लिए बाजार बना लिया। उन्हें समझ आया कि मूँगफली की ज्यादा कीमत नहीं मिलती जबकि मूँगफली तेल की बेहतर कीमत मिलती है, जिससे उन्होंने जैविक मूँगफली का तेल बेचना शुरू कर दिया।
वे अपना जैविक उत्पाद जतन और वसुंधरा के माध्यम से वड़ोदरा, अहमदाबाद में सात्त्विक फ़ूड फेस्टिवल में और राजकोट में कुछ दोस्तों को बेचते हैं। मूँगफली के आलावा वे बालों में लगाने के लिए तिल का तेल और खाने के लिए तिल से कचरिया बनाकर बेचते हैं
जब बीटी कॉटन पर गुजरात सहित देश भर में बहुत ज्यादा चर्चा हो रही थी, तब समतभाई ने गैर बीटी कॉटन फ़सल तैयार करने के लिए चार-पाँच साल मेहनत की। उन्होंने बीटी कॉटन मुक्त खेत से बीज एकत्र करना शुरू कर दिया और प्रयोग जारी रखा। हालाँकि, उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अंततः उन्होंने कपास की एक ऐसी किस्म विकसित की जो न तो हाइब्रिड है और न ही मोनसेंटो के अधिकार वाली किस्म या बीटी है, लेकिन फिर भी यह किस्म अच्छा उत्पादन देती है। यदि किसान बीटी मुक्त बीज लगाना चाहता है तो आज बाजार में शायद ही ऐसा बीज हो। ऐसे किसान समतभाई से इस तरह का बीज ले सकते हैं।
समतभाई बीटी मुक्त कपास से खादी के कपड़े बनाना चाहते थे। उनकी यह इच्छा भी मजबूत प्रयासों से पूरी हो गई। उन्होंने बीटी मुक्त कपास से खादी के कपड़े बनाएं हैं। ये कपड़े पूरी तरह से जैविक और प्राकृतिक हैं। कपड़ों को क्लोरीन से सफ़ेद नहीं किया गया है और और न ही रसायन रंगों से रंगा गया है। कपड़ों को कच्छ में परंपरागत विधि से रंगा जाता है। समतभाई को इस विधि के लिए गोंडल में उद्योग भारती ने मार्गदर्शन किया।
समतभाई ने वड़ोदरा में ग्रीन फिल्म फेस्टिवल के दौरान कहा, ‘जैविक खेती शुरू करने के बाद मेरे विचार भी बहुत शुद्ध हो गए हैं। मैं अपनी जरूरतें और इच्छाएं कम करने के बारे में निरंतर सोचता हूँ। समतभाई केवल खादी के कपड़े पहनते हैं और खादी का पायजामा की जगह घुटने तक की छोटा कपडा (शॉर्ट्स) पहनने के बारे में सोच रहे हैं।
समतभाई ने पाया की गाँव वालों के पास बीमारी के दौरान अनचाहे खर्च का सामना करने के लिए पैसा नहीं होता है। वे अपनी बचत में से गाँव वालों को इस तरह की जरूरत पड़ने पर आर्थिक सहायता करते हैं। उन्होंने देखा की गाँव की स्कूल की दीवार बहुत कमजोर है और जल्द ही गिर जाएगी तो उन्होंने शिक्षा अधिकारियों का ध्यान इस तरफ खीचने के लिए पाँच दिन लम्बा उपवास रखा।
उनके सभी प्रयासों और कठिन परिस्थितियों के दौरान उनकी पत्नी गौरिबहन ने उनका मजबूत नैतिक समर्थन किया है। आज जब उन्हें अपने कार्य के लिए बहुत ज्यादा यात्रा करना पड़ता है तो समतभाई हँसते हुए कहते हैं गौरी बहन खेतों की सही मायनों में मालिक है।
गुजरात राज्य के राज्यपाल ने समतभाई को 2012 में गाँधी मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया। यह पुरस्कार अहमदाबाद के विचार ट्रस्ट और राजकोट के सम्पदा द्वारा ऐसे व्यक्ति को प्रदान किया जाता है जिसने गाँव की विकास के लिए योगदान दिया है।
आज जब कई किसान आत्महत्या कर रहे हैं, ऐसे में समतभाई किसानों के लिए गाँधीवादी देवदूत हैं।
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